[अजय पांडेय], नई दिल्ली। सूबे की सियासत में अरविंद केजरीवाल का आगाज किसी नायक की तरह हुआ था। एक ऐसा चमत्कारिक व्यक्तित्व जिसके पास हर मर्ज की दवा थी। वह आधी कीमत में बिजली दे सकता था, वह समूची दिल्ली को मुफ्त पानी पिला सकता था, वह भ्रष्टाचार को नष्ट कर सकता था, वह सरकारी महकमों में अस्थायी तौर पर कार्यरत साढ़े चार लाख कर्मचारियों को नियमित कर सकता था। लेकिन हुकूमत से जब उनकी विदाई हुई तो वे चारों ओर से सियासी दृष्टि से बेबस नजर आ रहे थे।
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