शीला दीक्षित कहती है कि दिल्ली में विकास दीखता है मगर मै ज्यादा तो नहीं पर दो साल से दिल्ली में रह रहा हु मुझे आज तक ऐसा नहीं लगा जिसमे ये बात बोला जा सकता है कि दिल्ली में विकास दीखता है।
आप किसी भी रेलवे स्टेशन पर चले जाइये चाहे वह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन हो या पुरानी दिल्ली या कोई भी मेट्रो स्टेशन हर जगह आपको छोटे -छोटे बच्चे से लेकर कब्र में पांव लटकाए बूढ़े तक भीख मांगते मिल जायेंगे।
जिन बच्चों को इस उम्र में स्कूल में होना चाहिए था वो खाली पेट स्टेशन पे भीख मांगते है। आखिर इनका विकास कौन करेगा , आखिर इनका विकास क्यों नहीं हुआ और अगर इनका विकास नहीं हुआ तो हैम कैसे मान लें कि दिल्ली में विकास दीखता है। जब तक ये भूखे नंगे बच्चे और ये बेसहारा लोग सड़कों पर और स्टेशन में भीख मांगते दिखेंगे तब तक हम नहीं मान सकते कि दिल्ली में विकास दीखता है।
आप किसी भी रेलवे स्टेशन पर चले जाइये चाहे वह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन हो या पुरानी दिल्ली या कोई भी मेट्रो स्टेशन हर जगह आपको छोटे -छोटे बच्चे से लेकर कब्र में पांव लटकाए बूढ़े तक भीख मांगते मिल जायेंगे।
जिन बच्चों को इस उम्र में स्कूल में होना चाहिए था वो खाली पेट स्टेशन पे भीख मांगते है। आखिर इनका विकास कौन करेगा , आखिर इनका विकास क्यों नहीं हुआ और अगर इनका विकास नहीं हुआ तो हैम कैसे मान लें कि दिल्ली में विकास दीखता है। जब तक ये भूखे नंगे बच्चे और ये बेसहारा लोग सड़कों पर और स्टेशन में भीख मांगते दिखेंगे तब तक हम नहीं मान सकते कि दिल्ली में विकास दीखता है।
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